Lets Make Out ~

28 Mar 2012

ग़म दिल के पक्ष चुलबुले हैं 

पानी के ये बुलबुले हैं
बुझते हैं बनते रहते हैं
दिल से दिल से दिल से दिल से रे 

गुलज़ार साब 

 

8 Feb 2012

Gulzar Saab’s tribute to Jagjit Singh:

एक बौछार था वो -

एक बौछार था वो शख्स 
बिना बरसे
किसी अब्र की सहमी सी नमी से 
जो भिगो देता था

एक बौछार ही था वो
जो कभी धूप की अफ़शां भर के दूर तक
सुनते हुए चेहरों पे छिड़क देता था…
नीम तारीक से हॉल में आँखें चमक उठती थीं

सिर हिलाता था कभी झूम के टहनी की तरह
लगता था झोंका हवा का है
कोई छेड़ गया है..

गुनगुनाता था तो खुलते हुए बादल की तरह
मुस्कुराहट में कई तर्बों की झनकार छुपी थी

गली क़ासिम से चली एक ग़ज़ल की झनाकर था वो
एक अवाज़ की बौछार था वो


11 Nov 2011

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“थोडा सा रेशम, तू हमदम 

थोडा सा खुर्दुरा

कभी तो अड़ जाये 

या लड़ जाये

या खुशबू से भरा”

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15 Oct 2011

गुलपोश कभी इतराए कभी 

महके तो नज़र आ जाए कहीं 

ताबीज़ बना के पहनूं उसे 

आयत की तरह मिल जाए कहीं. 



मेरा नघ्मा वोही मेरा कलमा वोही 

यार मिसाले ओंस चले 

 पाँव के कथा फिरदौस चले

कभी डाल डाल कभी पात पात 

मैं हवा पे ढूंढूं उसके निशान 



चल 
छैय्याँ छैय्याँ

छैय्याँ छैय्याँ



वो यार है जो खुशबू की तरह

जिसकी ज़ुबां उर्दू की तरह 

मेरी शाम रात मेरी कायनात 

वो यार मेरा सैय्याँ सैय्याँ 



- गुलज़ार साब 


10 Oct 2011

RIP Jagjit Singh. No one, No one, can sing ghazals like you did. 

PS - Its unfair not to mention the brilliance of Arth here. Why won’t you make films anymore, Mahesh Bhatt?